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Saturday, July 3, 2010

बारिश

खिड़की से अचानक बारिश आई
एक तेज़ बौछार ने मुझे बीच नींद से जगाया
दरवाज़े खटखटाए ख़ाली बर्तनों को बजाया
उसके फुर्तील्रे क़दम पूरे घर में फैल गए
वह काँपते हुए घर की नींव में धँसना चाहती थी
पुरानी तस्वीरों टूटे हुए छातों और बक्सों के भीतर
पहुँचना चाहती थी तहाए हुए कपड़ों को
बिखराना चाहती थी वह मेरे बचपन में बरसना
चाहती थी मुझे तरबतर करना चाहती थी
स्कूल जानेवाले रास्ते पर
बारिश में एक एक कर चेहरे भीगते थे
जो हमउम्र थे पता नहीं कहाँ तितरबितर हो गए थे
उनके नाम किसी और बारिश में पुँछ गए थे
भीगती हुई एक स्त्री आई जिसका चेहरा
बारिश की तरह था जिसके केशों में बारिश
छिपी होती थी जो फ़िर एक नदी बनकर
चली जाती थी इसी बारिश में एक दिन
मैं दूर तक भीगता हुआ गया इसी में कहीं लापता
हुआ भूल गया जो कुछ याद रखना था
इसी बारिश में कहीं रास्ता नहीं दिखाई दिया
इसी में बूढ़ा हुआ जीवन समाप्त होता हुआ दिखा
एक रात मैं घर लौटा जब बारिश थी पिता
इंतज़ार करते थे माँ व्याकुल थी बहनें दूर से एक साथ
दौड़ी चली आई थीं बारिश में हम सिमटकर
पास-पास बैठ गए हमने पुरानी तस्वीरें देखीं
जिन पर कालिख लगी थी शीशे टूटे थे बारिश
बार बार उन चेहरों को बहाकर ले जाती थी
बारिश में हमारी जर्जरता अलग तरह की थी
पिता की बीमारी और माँ की झुर्रियाँ भी अनोखी थीं
हमने पुराने कमरों में झाँककर देखा दीवारें
साफ़ कीं जहाँ छत टपकती थी उसके नीचे बर्तन
रखे हमने धीमे धीमे बात की बारिश
हमारे हँसने और रोने को दबा देती थी
इतने घने बादलों के नीचे हम बार बार
प्रसन्न्ता के किसी किनारे तक जाकर लौट आते थे
बारिश की बूँदें आकर लालटेन का काँच
चिटकाती थीं माँ बीच बीच में उठकर देखती थी
कहीं हम भीग तो नहीं रहे बारिश में ।

----------------मंगलेश डबराल

बारिश

बारिश के लिए रात नहीं थी
वह तो बस बरस रही थी
हमारे लिए रात और बारिश थी ।

---------------प्रयाग शुक्ल

तुम्हारी यादें

नहीं भूलती है
जेठ की पहली बारिश के बाद
अकुलायी धरती से उठने वाली
वह सोंधी-सोंधी-सी गंध
नदियों, पहाड़ों और जंगलों को पार करते हुए
जाने कैसे चली आती है मुझ तक
और खिच्चे दानों में भरते दूध की तरह
मेरी आत्मा में भरती चली जाती है

कोयले की गर्द
और चिमनियों के विषाक्त धुएँ से भरे वायुमंडल में
जाने कैसे जीवित बच आती है वह गंध

भले ही हाथों में
धनरोपती के कीचड़ की जगह
ग्रीस और मोबिल लगते हैं
आँखें अब भी देखती हैं
लहलहाती फसलों का सपना

नहीं भूल पाता हूँ तुम्हें

ऊँची चिमनियों और गहरी खदानों की
सँप-सीढ़ियों वाली इस औद्योगिक नगरी में
हमें हलाल करने के लिए
माफिया और दलाल ही नहीं
क्रांति की बातों से बातों की क्रांति करने वाले
श्रमिक-नेताओं के भ्रमजाल भी हैं
और इनके बीच
मछेरे की हाँड़ी में कैद मछली-सा छटपटाता
गंवई-गांव का मेरा मन
बिछड़े तालाब की तरह लगातार तुम्हें याद करता रहता है

कभी भी तो नहीं भूल पाता हूँ तुम्हें
मक्के ही हरी बाल के खिच्चे दानों जैसी
तुम्हारी धवल दंतपंक्तियों से
झड़ने वाली उजली-उजली हँसी
अभी भी मेरी नींद में थिरकती है
आषाढ़ की बारिश में उपजे मोथे की जड़ों-सी मीठी
तुम्हारी यादें
गठिबंध सरीखी मेरी आत्मा से लिपटी हैं!

---------------------मदन कश्यप

Sunday, June 20, 2010

વરસાદ પછી

જ લ ભીં જે લી
જો બ ન વં તી
લથબથ ધરતી
અં ગ અં ગ થી
ટપકે છે કૈં
રૂપ મનોહર !
ને તડકાનો
ટુવાલ ધોળો
ફરી રહ્યો છે
ધીમે ધીમે;
યથા રાધિકા
જમુનાજલ માં
સ્નાન કરીને
પ્ર સ ન્ન તા થી
રૂપ ટપકતા
પારસ - દેહે
વસન ફેરવે
ધીરે ધીરે !

જોઈ રહ્યો છે
પરમ રૂપના
ઘૂંટ ભરંતો
શું મુજ શ્યામલ
નેનન માંહે
છુપાઈને એ
કૃષ્ણકનૈયો ?

-------લાભશંકર ઠાકર

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जानकार सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है

आ गया गर बस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

बावजूदे-इद्दआ-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो ज़माना याद है

-----------------------हसरत मोहानी

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं
अजीब लोग हैं मुँह में ज़ुबान रखते हैं

ख़ुशी तलाश न कर मुफ़लिसों की बस्ती में
ये शय अभी तो यहाँ हुक़्मरान रखते हैं

यहँ की रीत अजब दोस्तो, रिवाज अजब
यहाँ ईमान फक़त बे-ईमान रखते हैं

चबा-चबा के चबेने-सा खा रहे देखो
वो अपनी जेब में हिन्दोस्तान रखते हैं

ग़मों ने दिल को सजाया, दुखों ने प्यार किया
ग़रीब हम हैं मगर क़द्रदान रखते हैं

वे जिनके पाँव के नीचे नहीं ज़मीन कोई
वे मुठ्ठियों में कई आसमान रखते हैं

सजा के जिस्म न बेचें यहाँ, कहाँ बेचें
ग़रीब लोग हैं, घर में दुकान रखते हैं।

------------------नूर मुहम्मद `नूर'

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कूबूल हमने किये जिसके गम खुशी कि तरह

कभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह

------------------क़तील शिफ़ाई