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Saturday, May 14, 2011

અટકચાળા ન કર

સ્થિર જળ સાથે અટકચાળા ન કર,
કાંકરા નાખીને કૂંડાળા ન કર.

લોક દિવાળી ભલે ને ઊજવે,
પેટ બાળીને તું અજવાળાં ન કર!

આજથી ગણ આવનારી કાલને,
પાછલાં વરસોના સરવાળા ન કર!

કયાંક પથ્થર ફેંકવાનું મન થશે,
ઈંટને તોડીને ઢેખાળા ન કર.

થઈ શકે તો રૂબરૂ આવીને મળ,
ઊંઘમાં આવીને ગોટાળા ન કર.

છે કવિતાઓ બધી મોઢે મને,
મારી મિલકતનાં તું રખવાળા ન કર.

----------------- ખલીલ ધનતેજવી

આપણને નહીં ફાવે

તમે મન મૂકી વરસો, ઝાપટું આપણને નહીં ફાવે,
અમે હેલીના માણસ, માવઠું આપણને નહીં ફાવે.

કહો તો માછલીની આંખમાં ડૂબકી દઈ આવું,
પરંતુ છીછરું ખાબોચિયું, આપણને નહીં ફાવે.

તું નહીં આવે તો એ ના આવવું પણ ફાવશે અમને,
ઘરે આવી, તારું પાછું જવું, આપણને નહીં ફાવે.

વફાદારીની આ ધગધગતી તાપણીઓ બુઝાવી દો,
સળગતું દિલ, દઝાતું કાળજું આપણને નહીં ફાવે.

તને ચાહું, ને તારા ચાહનારાઓને પણ ચાહું?
તું દિલ આપી દે પાછું, આ બધું આપણને નહીં ફાવે.

તમાચો ખાઈ લઉ ગાંધીગીરીના નામ પર હું પણ,
પણ આ પત્નીને બા સંબોધવું, આપણને નહીં ફાવે.

ખલિલ, અણગમતાને ગમતો કરી લેવું નથી ગમતું,
ભલે તમને બધાને ફાવતું, આપણને નહીં ફાવે.

------------ખલીલ ધનતેજવી

Sunday, May 1, 2011

मुझको मारा है हर इक दर्द-ओ-दवा से पहले

मुझको मारा है हर इक दर्द-ओ-दवा से पहले
दी सज़ा इश्क ने हर ज़ुर्म-ओ-खता से पहले

आतिश-ए-इश्क भडकती है हवा से पहले
होंठ जलते हैं मोहब्बत में दुआ से पहले

अब कमी क्या है तेरे बेसर-ओ-सामानों को
कुछ ना था तेरी कसम तर्क-ओ-फ़ना से पहले

इश्क-ए-बेबाक को दावे थे बहुत खलवत में
खो दिया सारा भरम, शर्म-ओ-हया से पहले

मौत के नाम से डरते थे हम ऐ शौक-ए-हयात
तूने तो मार ही डाला था, कज़ा से पहले

हम उन्हे पा कर फ़िराक, कुछ और भी खोये गये
ये तकल्लुफ़ तो ना थे अहद-ए-वफ़ा से पहले

--------------------फ़िराक़ गोरखपुरी

Thursday, March 31, 2011

अब कौन से मौसम से

अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए
बरसात में भी याद जब न उनको हम आए

मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर कर
भीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए

दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखा
ज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए

बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा है
और मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए

शाखें हैं तो वो रक़्स में, पत्ते हैं तो रम में
पानी का नशा है कि दरख्तों को चढ़ जाए

हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरू
बारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छंकाए

अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारे
रुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए

-----------------परवीन शाकिर

Wednesday, February 23, 2011

बाद मुद्दत उसे देखा

बाद मुद्दत उसे देखा, लोगो
वो ज़रा भी नहीं बदला, लोगो

खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी
उसके चेहरे पे लिखा था लोगो

उसकी आँखें भी कहे देती थीं
रात भर वो भी न सोया, लोगो

अजनबी बन के जो गुजरा है अभी
था किसी वक़्त में अपना, लोगो

दोस्त तो खैर, कोई किस का है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगो

रात वो दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगो

---------------------परवीन शाकिर

Monday, February 14, 2011

साँझ फागुन की

फिर कहीं मधुमास की पदचाप सुन
डाल मेंहदी की लजीली हो गई!

दूर तक अमराइयों, वनबीथियों में
लगी संदल हवा चुपके पाँव रखने
रात-दिन फिर कान आहट पर लगाए
लगा महुआ गंध की बोली परखने

दिवस मादक होश खोए लग रहे
साँझ फागुन की नशीली हो गई!

हँसी शाखों पर कुँआरी मंजरी
फिर कहीं टेसू के सुलगे अंग-अंग
लौट कर परदेश से चुपचाप फिर
बस गया कुसुमी लताओं पर अनंग

चुप खड़ी सरसों की गोरी सी हथेली
डूब कर हल्दी में पीली हो गई!

फिर उड़ी रह-रह के आँगन में अबीर
फिर झड़े दहलीज पर मादक गुलाल
छोड़ चन्दन-वन चली सपनों के गाँव
गंध कुंकुम के गले में बाँह डाल

और होने के लिए रंगों से लथपथ
रेशमी चूनर हठीली हो गई!

-----------------रामानुज त्रिपाठी

तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी

तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी
बेदर्द मैं ने तुझ को भुलाया नहीं अभी

कल तूने मुस्कुरा के जलाया था ख़ुद जिसे
सीने का वो चराग़ बुझाया नहीं अभी

गदर्न को आज भी तेरे बाहों की याद है
चौखट से तेरी सर को उठाया नहीं अभी

बेहोश होके जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं अभी

----------------साहिर लुधियानवी