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Sunday, June 20, 2010

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जानकार सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कारख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है

आ गया गर बस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

बावजूदे-इद्दआ-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो ज़माना याद है

-----------------------हसरत मोहानी

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं
अजीब लोग हैं मुँह में ज़ुबान रखते हैं

ख़ुशी तलाश न कर मुफ़लिसों की बस्ती में
ये शय अभी तो यहाँ हुक़्मरान रखते हैं

यहँ की रीत अजब दोस्तो, रिवाज अजब
यहाँ ईमान फक़त बे-ईमान रखते हैं

चबा-चबा के चबेने-सा खा रहे देखो
वो अपनी जेब में हिन्दोस्तान रखते हैं

ग़मों ने दिल को सजाया, दुखों ने प्यार किया
ग़रीब हम हैं मगर क़द्रदान रखते हैं

वे जिनके पाँव के नीचे नहीं ज़मीन कोई
वे मुठ्ठियों में कई आसमान रखते हैं

सजा के जिस्म न बेचें यहाँ, कहाँ बेचें
ग़रीब लोग हैं, घर में दुकान रखते हैं।

------------------नूर मुहम्मद `नूर'

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह

किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कूबूल हमने किये जिसके गम खुशी कि तरह

कभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह

------------------क़तील शिफ़ाई

इतनी हसीन इतनी जवाँ रात, क्या करें

इतनी हसीन इतनी जवाँ रात, क्या करें
जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात, क्या करें ?

पेड़ों के बाजुओं में महकती है चांदनी
बेचैन हो रहे हैं ख़्यालात, क्या करें ?

साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक
दामन को छू रहा है कोई हाथ, क्या करें ?

शायद तुम्हारे आने से यह भेद खुल सके
हैराँ हैं कि आज नई बात क्या करें ?


-----------------------साहिर लुधियानवी

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें
चल निकलते जो मै पिये होते

क़हर हो या बला हो, जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिये होते

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब कई दिये होते

आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'
कोई दिन और भी जिये होते

---------------मिर्ज़ा ग़ालिब

Saturday, May 29, 2010

બા એકલાં જીવે

બા એકલાં જીવે….. બા સાવ એકલાં જીવે
એકલતાનાં વર્ષો એને ટીપે ટીપે પીવે
બાના ઘરમાં વેકેશન જ્યાં માળો બાંધી રહેતું
રસગુલ્લાની ચાસણી જેવું વ્હાલ નીતરતું વ્હેતું
દોડાદોડી, સંતાકૂકડી, સહુ પકડાઈ જાતાં
ભાઈ-ભગિની ભેળાં બેસી સુખનો હિંચકો ખાતાં
સુખડીમાં ઘી રેડી રેડી બા સહુને ખવડાવે
ઊડવાનું બળ આપી પાછી ઊડવાનું શીખડાવે
સુખનો સૂરજ છાનોમાનો જલતો ઘરના દીવે…
કાળ કુહાડી ફરી કપાયાં વેકેશનનાં ઝાડ
કોઈ હવે પંખી ના ફરકે ચણવા માટે લાડ
સૂનકાર ને સન્નાટાઓ ઘરમાં પહેરો ભરતાં
બાના જીવતરની છત પરથી શ્વેત પોપડા ખરતા
સુખડીનો પાયો દાઝેલો શેમાં એ ઘી રેડે
બાએ સહુના સપના તેડ્યા કોણ બાને તેડે
ફાટેલા સાળુડાં સાથે કૈંક નિ:સાસા સીવે
કમસે કમ કો ટપાલ આવે તાકે આંખો રોજ
નીચું ઘાલી જાય ટપાલી ખાલી થાતો હોજ
દાદાજીના ફોટા સામે ભીની આંખે પૂછે
ફ્રેમ થયેલા દાદા એનાં આંસુ ક્યાંથી લૂછે
શબરીજીને ફળી ગયા’તા બોર અને એ રામ
બાના આંસુ બોર બોર પણ ના ટપકે કો’ રામ
જીવતરથી ગભરાવી મૂકી મોતથી જે ના બીવે…
બા એકલાં જીવે….. બા સાવ એકલાં જીવે

----------------મુકેશ જોષી

તું પોતે મધ જેવી

એક તો તું પોતે મધ જેવી, એમાં તારું સ્મિત
જાણે મધમાં સાકર નાખી
મારી દષ્ટિ કેમ આટલી મીઠી, એ ના પૂછ
મેં તો તને નજરથી ચાખી

કડવાથી કડવા લીમડાની ડાળ પરે,
મધપૂડો બેસે એવી મારી હાલત
આખા જગમાં ખોબેખોબા ખૂબ
પતાસાં વહેંચું એવી ગળચટ્ટી આ બાબત

બંગાળી મીઠાઈ સમી તું સાંજ મને મોકલતી
ઉપર સ્પર્શનું અબરખ રાખી

તેં તો ખાલી છાંટો વાવ્યો ને
મારામાં શેરડીનું આ ખેતર ઊગી આવ્યું
મને જેમણે દાતરડાથી કાપ્યો,
એના ખોબામાંયે અમરત શું ઢોળાયું
જગમાંથી કડવાશ હટાવી રેલાવું મીઠાશ
મને જો મળી જાય તું આખી

------------મુકેશ જોષી