आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तन्हाई
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुस्वाई
ये फूल से चेहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते
राहें हैं तमाशाई राही भी तमाशाई
मैं और मेरी तन्हाई
अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई
मैं और मेरी तन्हाई
आकाश के माथे पर तारों का चराग़ां है
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई
मैं और मेरी तन्हाई
हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हँसती है हँस कर कभी गाती है
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अँगड़ाई
मैं और मेरी तन्हाई
------------------अली सरदार जाफ़री
Search the Collection
Tuesday, December 15, 2009
Monday, December 7, 2009
હરિ તમારી કટ્ટી !
હરિ તમારી કટ્ટી !
કડવી કડવી જિંદગી આપી વાત કરો ગળચટ્ટી !
લોકલ ટ્રેનમાં ઊભા રહીને એક દિવસ તો આવો,
હું ય જોઉં છું, કેમ કરીને બંસી તમે બજાવો !
યાદ આવશે પળભરમાં તો ગયા જનમનાં ઘાવો,
કાશી હો કે કુરૂક્ષેત્રે હો, બધ્ધે પીડે અભાવો,
દરેક યુગને માપવાની આ જુદી જુદી ફૂટપટ્ટી,
હરિ તમારી કટ્ટી !
કદીક ધરતીકંપ કરાવો કદીક લાવો પૂર,
અજગર જેવો દુકાળ દઈને કેમ ભીંસો ભરપૂર ?
છાતીમાં છે ધબકારા પણ ધબકારામાં ઝૂર,
નીર ખૂટ્યા છે ધરતીના ને નભના ખૂટ્યા નૂર,
અડતાવેંત જ લોહી નીકળે એવી થઈ છે મટ્ટી,
હરિ તમારી કટ્ટી !
-------------------------હિતેન આનંદપરા
કડવી કડવી જિંદગી આપી વાત કરો ગળચટ્ટી !
લોકલ ટ્રેનમાં ઊભા રહીને એક દિવસ તો આવો,
હું ય જોઉં છું, કેમ કરીને બંસી તમે બજાવો !
યાદ આવશે પળભરમાં તો ગયા જનમનાં ઘાવો,
કાશી હો કે કુરૂક્ષેત્રે હો, બધ્ધે પીડે અભાવો,
દરેક યુગને માપવાની આ જુદી જુદી ફૂટપટ્ટી,
હરિ તમારી કટ્ટી !
કદીક ધરતીકંપ કરાવો કદીક લાવો પૂર,
અજગર જેવો દુકાળ દઈને કેમ ભીંસો ભરપૂર ?
છાતીમાં છે ધબકારા પણ ધબકારામાં ઝૂર,
નીર ખૂટ્યા છે ધરતીના ને નભના ખૂટ્યા નૂર,
અડતાવેંત જ લોહી નીકળે એવી થઈ છે મટ્ટી,
હરિ તમારી કટ્ટી !
-------------------------હિતેન આનંદપરા
સાંભળ્યું ?
ઝુલ્ફમાં ભૂલી પડેલી આંગળી, તેં સાંભળ્યું ?
રાતભરનો થાક લઈ પાછી વળી, મેં સાંભળ્યું.
આંગળી ખંડેરનો હિસ્સો નથી, તેં સાંભળ્યું ?
છે હવે ગુલમહોરની કળી, મેં સાંભળ્યું.
ટેરવે ઘેઘુર સન્નાટો હતો, તેં સાંભળ્યું ?
દરબદર વાગે હવે ત્યાં વાંસળી, મેં સાંભળ્યું.
છે ઉઝરડા મખમલી આકાશમાં, તેં સાંભળ્યું ?
આ નખોનું નામ હિંસક વીજળી, મેં સાંભળ્યું.
સાવ બરછટ એ બધો વિસ્તાર છે, તેં સાંભળ્યું ?
એટલે જ ત્યાં સ્પર્શની લાશો ઢળી, મેં સાંભળ્યું.
આ અજાણ્યો દેશ માફક આવશે, તેં સાંભળ્યું ?
એક જાણીતી ગલી અહિંયા મળી, મેં સાંભળ્યું.
આપણું મળવું ગઝલ કહેવાય છે, તેં સાંભળ્યું ?
કાફિયા ઓઢી ફગાવી કામળી, મેં સાંભળ્યું.
----------------------------વિનોદ જોશી
રાતભરનો થાક લઈ પાછી વળી, મેં સાંભળ્યું.
આંગળી ખંડેરનો હિસ્સો નથી, તેં સાંભળ્યું ?
છે હવે ગુલમહોરની કળી, મેં સાંભળ્યું.
ટેરવે ઘેઘુર સન્નાટો હતો, તેં સાંભળ્યું ?
દરબદર વાગે હવે ત્યાં વાંસળી, મેં સાંભળ્યું.
છે ઉઝરડા મખમલી આકાશમાં, તેં સાંભળ્યું ?
આ નખોનું નામ હિંસક વીજળી, મેં સાંભળ્યું.
સાવ બરછટ એ બધો વિસ્તાર છે, તેં સાંભળ્યું ?
એટલે જ ત્યાં સ્પર્શની લાશો ઢળી, મેં સાંભળ્યું.
આ અજાણ્યો દેશ માફક આવશે, તેં સાંભળ્યું ?
એક જાણીતી ગલી અહિંયા મળી, મેં સાંભળ્યું.
આપણું મળવું ગઝલ કહેવાય છે, તેં સાંભળ્યું ?
કાફિયા ઓઢી ફગાવી કામળી, મેં સાંભળ્યું.
----------------------------વિનોદ જોશી
एक पल में एक सदी का मज़ा
एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए
भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए
आगाज़-ए-आशिकी का मज़ा आप जानिए
अंजाम-ए-आशिकी का मज़ा हमसे पूछिए
जलते दियों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ
सरकार रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए
वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है
आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हमसे पूछिए
हँसने का शौक़ हमको भी था आप की तरह
हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए
हम तौबा कर के मर गए कबले अजल "ख़ुमार"
तौहीन-ए-मयकशी का मज़ा हमसे पूछिये
----------------------ख़ुमार बाराबंकवी
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए
भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए
आगाज़-ए-आशिकी का मज़ा आप जानिए
अंजाम-ए-आशिकी का मज़ा हमसे पूछिए
जलते दियों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ
सरकार रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए
वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है
आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हमसे पूछिए
हँसने का शौक़ हमको भी था आप की तरह
हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए
हम तौबा कर के मर गए कबले अजल "ख़ुमार"
तौहीन-ए-मयकशी का मज़ा हमसे पूछिये
----------------------ख़ुमार बाराबंकवी
तुम पूछो और मैं न बताऊँ
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं
माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं
ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं
मेरे ग़मगीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान "क़तील"
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं
-------------------------क़तील शिफ़ाई
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं
माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं
ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं
मेरे ग़मगीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान "क़तील"
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं
-------------------------क़तील शिफ़ाई
गुज़रे दिनों की याद
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे
मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे
वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे
तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे
----------------------क़तील शिफ़ाई
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे
मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे
वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे
तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे
----------------------क़तील शिफ़ाई
रात जुदाई की
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की
उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की
--------------------------क़तील शिफ़ाई
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की
वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की
उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की
--------------------------क़तील शिफ़ाई
Subscribe to:
Posts (Atom)