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Monday, October 4, 2010

નાનકડી નારનો મેળો

હાલો પરોઢિયે ખોલ્યાં છે પોપચાં,
તેજના ટશિયા ફૂટે રે લોલ :
ઘમ્મર વલોણે ગાજે ગોરસિયાં,
ખીલેથી વાછડાં છૂટે રે લોલ.

હાલોને સહિયર ! પાણીડાં જઈએ,
વીરડે વાતું કરશું રે લોલ :
વાટકે વાટકે ભરશું રે લોલ.

આખાબોલું તે અલી અલ્લડ જોબનિયું,
હૈયે ફાગણિયો ફોરે રે લોલ :
ઘૂમટો તાણીને હાલો ઉતાવળી,
ઘરડા બેઠા છે ગામચોરે રે લોલ…. હાલોને સહિયર….

નેણનાં નેવાંને ઊટકે આંજણિયાં,
હથેળી હેલને માંજે રે લોલ :
ચકચકતી ચૂની ને ચકચકતું બેડલું,
એકબીજાને ગાંજે રે લોલ….. હાલોને સહિયર…..

સાસુને માગ્યાં ઊનાં પાણી ને
સસરે દાતણ માગ્યું રે લોલ;
કાચી નીંદરને કાંઠેથી સપનું
મુઠ્ઠી વાળીને ભાગ્યું રે લોલ…. હાલોને સહિયર…..

હાલો પરોઢિયે ખોલ્યાં છે પોપચાં
તેજના ટશિયા ફૂટે રે લોલ :
મેળો જામ્યો છે અહીં નાનકડી નારનો,
આપણી વાતું નો ખૂટે રે લોલ….. હાલોને સહિયર…..

----------------------– વેણીભાઈ પુરોહિત

Tuesday, September 7, 2010

मार-गज़ीद

मासूमियत और हमाक़त में पल भर का फ़ासला है
मेरी बस्ती में पिछली बरसात के बाद
इक ऐसी अ’साब्शिकन ख़ुशबू फ़ैली है
जिसके असर से
मेरे क़बीले के सारे ज़ीरक अफ़राद
अपनी-अपनी आँखों की झिल्ली मटियाली कर बैठे हैं
सादालौह तो पहले ही
सरकंडों और चमेली के झाड़ों के पास
बेसुध पाए जाते थे
दहन के अन्दर घुलते ही
नीम के पत्तों का यूँ बर्ग-ए-गुलाब हो जाना तो मज़बूरी थी
हैरत तो इस बात पे है के आक के पौधों की माजूदगी के बावस्फ़
वारिस-ए-तसनीम-ओ कौसर
ऐसी लुआब-आलूद मिठास को आब-ए-हयात समझ बैठे हैं।
मासूमियत और हमाक़त में पल-भर का फ़ासला है !

-------------------परवीन शाकिर

हनीमून

सुर्ख़ अंगूर से छनी हुई ये सर्द हवा
जिसको क़तरा-क़तरा पी कर
मेरे तन की प्यासी शाख़ के सारे पीले फूल गुलाबी होने लगे हैं
सोच के पत्थर पे ऐसी हरियाली उग आई है
जैसे इनका और बारिश का बड़ा पुराना साथ रहा हो
हरियाली के सब्ज़ नशे में डूबी ख़ुश्बू
मेरी आँखें चूम रही है
ख़ुश्बू के बोसों से बोझल मेरी पलकें
ऐसे बंद हुई जाती हैं
जैसे सारी दुनिया इक गहरा नीला सय्याल है
जो पाताल से मुझको अपनी जानिब खींच रहा है
और मैं तन के पूरे सुख से
इस पाताल की पहनाई में
धीरे-धीरे डूब रही हूँ

----------------परवीन शाकिर

Wednesday, August 4, 2010

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था

आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिनसे इसी र’अनाई के
जिसकी इन आँखों ने बेसूद इबादत की है

तुझ से खेली हैं वह महबूब हवाएँ जिनमें
उसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेहताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है

तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंठ
ज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझ पे उठी हैं वह खोई-खोई साहिर आँखें
तुझको मालूम है क्यों उम्र गँवा दी हमने

हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूँ
हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ

आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मां के दुख-दर्द के म’आनी सीखे
ज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे

जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिनके
अश्क आंखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
नातवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तौले हुए मंडराते हुए आते हैं

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग-सी सीने में रह-रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है

-------------------फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की

अब कहाँ रस्म घर लुटाने की
बर्कतें थी शराबख़ाने की

कौन है जिससे गुफ़्तुगु कीजे
जान देने की दिल लगाने की

बात छेड़ी तो उठ गई महफ़िल
उनसे जो बात थी बताने की

साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिल
रह गई आरज़ू सुनाने की

चाँद फिर आज भी नहीं निकला
कितनी हसरत थी उनके आने की

-----------------फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

Friday, July 23, 2010

निगाह का वार था

निगाह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी
चली थी बरछी किसी पर किसी के आन लगी

किसी के दिल का सुनो हाल दिल लगाकर तुम
जो होवे दिल को तुम्हारे भी मेहरबान लगी

तू वह हलाले जबीं है की तारे बन बनकर
रहे हैं तेरी तरफ चश्म इक जहान लगी

उदारी हिर्स ने आकर जहान में सबकी ख़ाक
नहीं है किसको हवा ज़ेरे-आसमान लगी

किसी की काविशे-मिज़गां से आज सारी रात
नहीं पलक से पलक मेरी एक आन लगी

तबाह बहरे-जहां में थी अपनी कश्ती-ए-उम्र
सो टूट-फूट के बारे किनारे आन लगी

-----------------------ज़ौक़

तेरा बीमार न सँभला जो सँभाला लेकर

तेरा बीमार न सँभला जो सँभाला लेकर
चुपके ही बैठे रहे दम को मसीहा लेकर

शर्ते-हिम्मत नहीं मुज़रिम हो गिरफ्तारे-अज़ाब
तूने क्या छोड़ा अगर छोड़ेगा बदला लेकर

मुझसा मुश्ताक़े-जमाल एक न पाओगे कहीं
गर्चे ढूँढ़ोगे चिराग़े-रुखे-ज़ेबा लेकर

तेरे क़दमों में ही रह जायेंगे, जायेंगे कहाँ
दश्त में मेरे क़दम आबलाए-पा लेकर

वाँ से याँ आये थे ऐ 'ज़ौक़' तो क्या लाये थे
याँ से तो जायेंगे हम लाख तमन्ना लेकर

------------------------ज़ौक़