गम रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत गम रहा
हुस्न था तेरा बहुत आलम फरेब
खत के आने पर भी इक आलम रहा
मेरे रोने की हकीकत जिस में थी
एक मुद्दत तक वो कागज नम रहा
जामा-ऐ-एहराम-ऐ-ज़ाहिद पर न जा
था हरम में लेकिन ना-महरम रहा
----------------'मीर'
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Saturday, August 2, 2008
ये धुएँ का एक घेरा
ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिसमें रह रहा हूँ
मुझे किस क़दर नया है, मैं जो दर्द सह रहा हूँ
ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तेरा इंतज़ार था जो मैं इसी जगह रहा हूँ
मैं ठिठक गया था लेकिन तेरे साथ—साथ था मैं
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ
तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तेरी ज़िन्दगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ
कभी दिल में आरज़ू—सा, कभी मुँह में बद्दुआ—सा
मुझे जिस तरह भी चाहा, मैं उसी तरह रहा हूँ
मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ
यहाँ कौन देखता है, यहाँ कौन सोचता है
कि ये बात क्या हुई है,जो मैं शे’र कह रहा हूँ
-----------------साये में धूप / दुष्यन्त कुमार
मुझे किस क़दर नया है, मैं जो दर्द सह रहा हूँ
ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तेरा इंतज़ार था जो मैं इसी जगह रहा हूँ
मैं ठिठक गया था लेकिन तेरे साथ—साथ था मैं
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ
तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तेरी ज़िन्दगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ
कभी दिल में आरज़ू—सा, कभी मुँह में बद्दुआ—सा
मुझे जिस तरह भी चाहा, मैं उसी तरह रहा हूँ
मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ
यहाँ कौन देखता है, यहाँ कौन सोचता है
कि ये बात क्या हुई है,जो मैं शे’र कह रहा हूँ
-----------------साये में धूप / दुष्यन्त कुमार
ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती
ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती
ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती
इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं
जिनमें बस कर नमी नहीं जाती
देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती
शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती
एक आदत —सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती
मयकशो मय ज़रूर है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती
मुझको ईसा बना दिया तुमने
अब शिकायत भी की नहीं जाती
---------------साये में धूप / दुष्यन्त कुमार
ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती
इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं
जिनमें बस कर नमी नहीं जाती
देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती
शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती
एक आदत —सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती
मयकशो मय ज़रूर है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती
मुझको ईसा बना दिया तुमने
अब शिकायत भी की नहीं जाती
---------------साये में धूप / दुष्यन्त कुमार
कभी यूँ भी तो हो
कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें
कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से
कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
---------------जावेद अख़्तर
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें
कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से
कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो
और तुम आओ
कभी यूँ भी तो हो
---------------जावेद अख़्तर
પ્રેમ એટલે કે
પ્રેમ એટલે કે સાવ ખુલ્લી આંખોથી થતો મળવાનો વાયદો
સ્વપ્નમાં પળાય એવો કાયદો
પ્રેમ એટલે કે તારા ગાલોના ખાડામાં
ડૂબી જતાં મારાં ચોર્યાસી લાખ વહાણોનો કાફલો !
ક્યારે ય નહીં માણી હોય એવી કોઈ મોસમનો
કલરવ યાદ આવે, એ પ્રેમ છે
દાઢી કરતાં જો લોહી નીકળે, ને ત્યાં જ કોઈ
પાલવ યાદ આવે, એ પ્રેમ છે
પ્રેમ એટલે કે સાવ ઘરનો એક ઓરડો,
ને તોયે આખા ઘરથી અલાયદો…
કાજળ આંજીને તને જોઉં તો તું લાગે
એક છોકરી, ને તે ય શ્યામવરણી
વાદળ આંજીને જોતાં એવું લાગ્યું કે,
મને મૂકી, આકાશને તું પરણી
પ્રેમમાં તો ઝાકળ આંજીને તને જોવાને હોય
અને ફૂલોમાં ભરવાનો હોય છે મુશાયરો !
--------------મુકુલ ચોક્સી
સ્વપ્નમાં પળાય એવો કાયદો
પ્રેમ એટલે કે તારા ગાલોના ખાડામાં
ડૂબી જતાં મારાં ચોર્યાસી લાખ વહાણોનો કાફલો !
ક્યારે ય નહીં માણી હોય એવી કોઈ મોસમનો
કલરવ યાદ આવે, એ પ્રેમ છે
દાઢી કરતાં જો લોહી નીકળે, ને ત્યાં જ કોઈ
પાલવ યાદ આવે, એ પ્રેમ છે
પ્રેમ એટલે કે સાવ ઘરનો એક ઓરડો,
ને તોયે આખા ઘરથી અલાયદો…
કાજળ આંજીને તને જોઉં તો તું લાગે
એક છોકરી, ને તે ય શ્યામવરણી
વાદળ આંજીને જોતાં એવું લાગ્યું કે,
મને મૂકી, આકાશને તું પરણી
પ્રેમમાં તો ઝાકળ આંજીને તને જોવાને હોય
અને ફૂલોમાં ભરવાનો હોય છે મુશાયરો !
--------------મુકુલ ચોક્સી
चलो इक बार फिर से
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से ।
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से,
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से ॥
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से,
मुझे भी लोग कहते हैं ये जलवे पराए हैं ।
मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की,
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं ॥
तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥
----------साहिर लुधियानवी
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से ।
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से,
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से ॥
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से,
मुझे भी लोग कहते हैं ये जलवे पराए हैं ।
मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की,
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं ॥
तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥
----------साहिर लुधियानवी
જાણીબૂઝીને
જાણીબૂઝીને અમે અળગાં ચાલ્યાં
ને છતાં પાલવ અડક્યાનો મને વ્હેમ છે
સાવ રે સફાળા તમે ચોંકી ઉઠ્યા
ને, પછી ઠીક થઇ પૂછ્યું કે કેમ છે’ ?
આટલા અબોલા પછી આવો સવાલ,
કહો કેમ કરી ઊતરવું પાનું?
મૂંગા રહીએ તો તમે કારણ માનો ને,
હોઠ ખોલીએ તો બોલવાનું બ્હાનું !
હું તો બોલીશ છતાં માનશો તમે કે
હજી દુનિયા આ મારી હેમખેમ છે !
વાયરાથી નળિયાને ફૂટી છે પાંખ,
થઇ ચાલતી દીવાલ થકી ઇંટો ?
ભર રે ચોમાસે હવે છાપરા વિનાનો,
કેમ કોરો રહે સ્મરણોનો વીંટો ?
દુનિયાની વાત મૂકો, માનશો તમે કે,
હજી આપણી વચાળે જરી પ્રેમ છે ?
----------હરીન્દ્ર દવે
ને છતાં પાલવ અડક્યાનો મને વ્હેમ છે
સાવ રે સફાળા તમે ચોંકી ઉઠ્યા
ને, પછી ઠીક થઇ પૂછ્યું કે કેમ છે’ ?
આટલા અબોલા પછી આવો સવાલ,
કહો કેમ કરી ઊતરવું પાનું?
મૂંગા રહીએ તો તમે કારણ માનો ને,
હોઠ ખોલીએ તો બોલવાનું બ્હાનું !
હું તો બોલીશ છતાં માનશો તમે કે
હજી દુનિયા આ મારી હેમખેમ છે !
વાયરાથી નળિયાને ફૂટી છે પાંખ,
થઇ ચાલતી દીવાલ થકી ઇંટો ?
ભર રે ચોમાસે હવે છાપરા વિનાનો,
કેમ કોરો રહે સ્મરણોનો વીંટો ?
દુનિયાની વાત મૂકો, માનશો તમે કે,
હજી આપણી વચાળે જરી પ્રેમ છે ?
----------હરીન્દ્ર દવે
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