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Monday, November 12, 2012

वह बाग़ में मेरा मुंतज़िर था

वह बाग़ में मेरा मुंतज़िर था
और चांद तुलूअ हो रहा था
ज़ुल्फ़े-शबे-वस्ल खुल रही थी
ख़ुशबू साँसों में घुल रही थी
आई थी मैं अपने पी से मिलने
जैसे कोई गुल हवा में खिलने
इक उम्र के बाद हँसी थी
ख़ुद पर कितनी तवज्जः दी थी
पहना गहरा बसंती जोड़ा
और इत्र-ए-सुहाग में बसाया
आइने में ख़ुद को फिर कई बार
उसकी नज़रों से मैंने देखा
संदल से चमक रहा था माथा
चंदन से बदन दमक रहा था
होंठों पर बहुत शरीर लाली
गालों पे गुलाल खेलता था
बालों में पिरोए इतने मोती
तारों का गुमान हो रहा था
अफ़्शाँ की लकीर माँग में थी
काजल आँखों में हँस रहा था
कानों में मचल रही थी बाली
बाहों में लिपट रहा था गजरा
और सारे बदन से फूटता था
उसके लिए गीत जो लिखा था
हाथों में लिए दिये की थाली
उसके क़दमों में जाके बैठी
आई थी कि आरती उतारूँ
सारे जीवन को दान कर दूँ
देखा मेरे देवता ने मुझको
बाद इसके ज़रा-सा मुस्कराया
फिर मेरे सुनहरे थाल पर हाथ
रखा भी तो इक दिया उठाया
और मेरी तमाम ज़िन्दगी से
माँगी भी तो इक शाम माँगी

--------------------------------------परवीन शाकिर

Sunday, October 21, 2012

પિયર ગયેલી ભરવાડણની ગઝલ

પનઘટે છલકાતી ગાગર સાંભરે,
દી ઊગે ને રોજ સહીયર સાંભરે.

છેડલો ખેંચી શિરામણ માગતો,
વાસીદું વાળું ને દિયર સાંભરે.

ત્રાડ સાવજની પડે ભણકારમાં,
રાતના થરથરતું પાધર સાંભરે.

ઢોલિયે ઢાળું હું મારો દેહ ને,
બાથમાં લઈ લેતી નીંદર સાંભરે.

કાંબીયું ખાવડે ને હું ચોકીં ઊઠું,
ઝાંઝરો રણકે ને જંતર સાંભરે.

તાણ ભાભુજીએ કીધી'તી નકર,
કોણ બોલ્યું તું કે મહિયર સાંભરે.

મા! મને ગમતું નથી આ ગામમાં,
હાલ્ય, બચકું બાંધ, આયર સાંભરે.

------------------------------નયન દેસાઈ

Saturday, September 29, 2012

रस में डूबा हुआ लहराता बदन क्या कहना

रस में डूबा हुआ लहराता बदन क्या कहना
करवटें लेती हुई सुबह-ए-चमन क्या कहना

बाग़-ए-जन्नत में घटा जैसे बरस के खुल जाये
सोंधी सोंधी तेरी ख़ुश्बू-ए-बदन क्या कहना

जैसे लहराये कोई शोला कमर की ये लचक
सर ब-सर आतिश-ए-सय्याल बदन क्या कहना

क़ामत-ए-नाज़ लचकती हुई इक क़ौस-ओ-ए-क़ज़ाह
ज़ुल्फ़-ए-शब रंग का छया हुआ गहन क्या कहना

जिस तरह जल्वा-ए-फ़िर्दौस हवाओं से छीने
पैराहन में तेरे रंगीनी-ए-तन क्या कहना

जल्वा-ओ-पर्दा का ये रंग दम-ए-नज़्ज़ारा
जिस तरह अध-खुले घुँघट में दुल्हन क्या कहना

जगमगाहट ये जबीं की है के पौ फटती है
मुस्कुराहट है तेरी सुबह-ए-चमन क्या कहना

ज़ुल्फ़-ए-शबगूँ की चमक पैकर-ए-सीमें की दमक
दीप माला है सर-ए-गंग-ओ-जमन क्या कहना

--------------------------------फ़िराक़ गोरखपुरी

Thursday, September 27, 2012

जागती रात अकेली-सी लगे

जागती रात अकेली-सी लगे
ज़िंदगी एक पहेली-सी लगे

रुप का रंग-महल, ये दुनिया
एक दिन सूनी हवेली-सी लगे

हम-कलामी तेरी ख़ुश आए उसे
शायरी तेरी सहेली-सी लगे

मेरी इक उम्र की साथी ये ग़ज़ल
मुझ को हर रात नवेली-सी लगे

रातरानी सी वो महके ख़ामोशी
मुस्कुरादे तो चमेली-सी लगे

फ़न की महकी हुई मेंहदी से रची
ये बयाज़ उस की हथेली-सी लगे  

---------------------------अब्दुल अहद ‘साज़’

Tuesday, August 28, 2012

मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते

मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते

दीवाना तुम्हारा कोई ग़ैर नहीं
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते

ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते

तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते

----------------------------- ज़फ़र गोरखपुरी

और काँटों को लहू किसने पिलाया होगा

और काँटों को लहू किसने पिलाया होगा
हम-सा दीवाना चमन में कोई आया होगा

बेसबब कोई उलझता है भला कब किससे
तुमने गुज़रा हुआ कल याद दिलाया होगा

जुज़ हमारे ऐ सुलगती हुई तन्हाई तुझे
ऐसे सीने से भला किसने लगाया होगा

कोई आया है न ‘शहज़ाद’ कोई आएगा
वहम ने याद के पर्दों को हिलाया होगा

---------------------------फ़रहत शहज़ाद

मसीहा उंगलियां तेरी

मुझे इक बोझ की सूरत
उठाकर शाम कांधे पर

जब अपने घर पटक देती है लाकर
तेरे होठों की ज़िंदा मुस्कराहट

उठाती है मुझे
कहती है आओ

तुम्हारा बोझ पलकों पर उठा लूँ
सब अच्छा है

सभी ने घर में खाना खा लिया है
बघारी दाल, सोंधी रोटियाँ, आलू की सब्ज़ी, गर्म चाय

और उससे भी बहुत मीठा तेरा अंदाज़े दिलदारी
तेरी मानूस ग़मख़ारी

हथेली तेल बनकर जज्ब़ हो जाती है मेरे गर्म सर में
समा जाती हैं बालों में मसीहा उंगलियां तेरी

मुझे महसूस होता है
मेरे बिखरे हुए आज़ा दुबारा जुड़ गए हैं....

----------------------------- ज़फ़र गोरखपुरी